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Sunday, April 22, 2012

छुप छुप के मै रोता हू, छुप छुप के गम मै सहता हू
हर बार अपनों से धोका खाकर, उनके साथ मै हँसता रहता हू
सामने धोका खाता हू सामने जुल्म को सहता हू 
यारो मै अब बहुत थक गया हू जुल्म सहा नही जाता हे 
कोई तो कहे चलो अब बहुत हुआ सुख का स्वाद चखाता हू.

गिर्राज.
मुझे जिंदगी से मिला क्या ये मुझे भी पता नही
मुझे जिंदगी से गिला क्या ये भी मुझे पता नही
जिंदगी का इसमें क्या कसूर हे यारो 
लोग जिंदगी को ही जिंदगी नही देते क्यों इसका भी मुझे पता नही

गिर्राज.

Tuesday, April 3, 2012

जीवन तो हमें अपनों से मिला हे गैरों से जीवन जीने की कला 
जिंदगी ख़ुशी से बीते इसलिए मांगते हे इश्वर से दुआ
जय श्री राधे