Powered By Blogger

Tuesday, September 18, 2012

वक्त

कुछ दोस्त कमीने निकले कुछ वक्त खराब था
मैं उन दिनों वरना सौ फीसदी कामयाब था 

कब सोचा था नागफनी मेरे आंगन में उगे 
मेरी सोच में बचपन से महकता गुलाब था 

हां साज़िसों के आगे बेबस थी मेरी तकदीर 
बेईमानों के झुण्ड में मैं अकेला जनाब था 

मेरे साथ यारों को हिस्से का आसमां मिले 
यही तो जुर्म था मेरा बस यही इक ख्वाब था

चलेगी साँस जब तलक ना भूलूंगा वो मंजर
मेरी बर्बादी का हर एक कदम लाजवाब था

नही मालूम क्यूं हो गया था सफर बनवास
मेरे पास मेरी मेहनत का पूरा हिसाब था

अब तू मिल गया है मुझे फिर बना लूँगा महल
पूछा तो खंडहरों का गगन यही जवाब था —





No comments: